हर तरफ हर जगह...
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी;
फिर भी तन्हाईयों का शिकार आदमी;
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ;
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी;
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ;
हर नए दिन नया इतज़ार आदमी;
हर तरफ भागते दौड़ते का शिकार आदमी;
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी;
ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र;
आखिरी सांस तक बेक़रार आदमी।
Woh Kya Jane Pyar Ki Keemat Kya Hoti Hai,
Jab Nhi Milta Pyar To Aankhe Kitna Roti Hain,
Kbhi Na Kbhi To Wo Bhi Kisi Se Dil Lagayegi,
Karegi Vo Bewafai To Meri Wafa Ki Yaad Ayegi.
क्यूँ तबीअत कहीं...
क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं;
दोस्ती तो उदास करती नहीं;
हम हमेशा के सैर-चश्म सही;
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं;
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह;
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं;
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन;
इतनी आसानियों से मरती नहीं;
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़;
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं।
यूँ तो घुट जाएगा दम कुछ हवा तो आने दो
तोड़ दे जो ख़ामोशी वो सदा तो आने दो
छोड़ देंगें साथ सब जिनकों समझा हमसफ़र
पेश राहों में कोई वाकि़आ तो आने दो
कुछ जुदा तुमसे रहे, कुछ क़दम तन्हा चलें
दरमियां अपने ज़रा फ़ासिला तो आने दो
ढूँढ लेंगें कितने ही रास्ते और मंज़िलें
इस बियाबां में नज़र नक़्शे-पा तो आने दो
हम अकेले ही सही मगर चलते रहे
ये न कहते थे कोई क़ाफ़िला तो आने दो......