कठिन है राह-गुज़र...
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो;
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो;
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है;
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो;
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं;
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
है धूंध से लिपटी हर राहें
खोये है, मंजिल का पता पायें कैसे?
बडी खामोश है बेबसी,
नि:शब्द है,शब्दों का पता पायें कैसे?
हर रात तेरी यादों का कहर ढाती आयी,
कातिल है अंधेरा,सुबह का पता पायें कैसे?
उलझनें रिश्तों की कुछ ऐसी पायी,
खो चूके है,अब खूद का पता पायें कैसे?
जब हो तुझे मेरी जरुरत
मैं हाज़िर हो जाऊ
जीवन में हो जब बुरा वक़्त
मैं साथ निभाऊ
ख़ुशी मिले तुम्हे जब इस जहाँ में
मैं पीछे खड़ा हो मुस्कुराऊ
जीवन में हर वक़्त तेरी परछाई बन
मैं तेरे साथ चलता जाऊ.
जो गुमां करे इस नक्श पे, वो अक्स भी एक खाक है
जिस सादगी में नूर हो, वो हुस्न ही मेहताब है
जिस नजर में खुमार हो,जो जिगर से जांनिसार हो
जिसे जलके ही करार हो, वो इश्क ही आफताब है
कुछ खूबसूरत से पल किस्सा बन जाते है;
जाने कब जिंदगी का हिस्सा बन जाता है;
कुछ लोग अपने होकर भी अपने
नहीं होते;
और कुछ बेगाने होकर
भी जिंदगी का हिस्सा बन जाते है।
इन दुनिया में :v: दो पौधे ऐसे हैं जो कभी :hibiscus: मुरझाते नहीं, और अगर जो मुरझा गए तो उसका कोई :hospital: इलाज नहीं, पहला :heart: ‘नि:स्वार्थ प्रेम’और दूसरा ‘अटूट विश्वास’
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र
के हम है;
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम है;
पहले हर चीज़
थी अपनी मगर अब लगता है;
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के
हम है;
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से;
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं;
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब;
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम है।