है धूंध से लिपटी हर राहें
खोये है, मंजिल का पता पायें कैसे?
बडी खामोश है बेबसी,
नि:शब्द है,शब्दों का पता पायें कैसे?
हर रात तेरी यादों का कहर ढाती आयी,
कातिल है अंधेरा,सुबह का पता पायें कैसे?
उलझनें रिश्तों की कुछ ऐसी पायी,
खो चूके है,अब खूद का पता पायें कैसे?
यही हुआ कि हवा ले गई उड़ा केमुझे
तुझे तो कुछ न मिला ख़ाक मेंमिला के मुझे
बस एक गूँज है जो साथ-साथचलती है
कहाँ ये छोड़ गए फ़ासले सदा केमुझे
हो इक अदा तो उसे नाम दूँतमन्ना का
हज़ार रंग हैं इस शोला-ए-हिनाके मुझे
बलन्द शाख़ से उलझा था चाँदपिछले पहर
गुज़र गया है कोई ख़्वाब-सादिखा के मुझे
मैं अपनी मौज में डूबा हुआजज़ीरा हूँ
उतर गया है समन्दर बलन्द पाके मुझे
तुझे पाने की इसलिए जिद्द नहीं करता,
कि तुझे खोने को दिल नहीं करता,
तु मिलता है तो इसलिए नजरें नहीं उठाते,
कि फिर नजरें हटाने को दिल नहीं करता,
दिल की बात इसलिए तुझ से नहीं करता,
कि तेरा दिल दुखाने को दिल नहीं करता,
ख्वाबो में इसलिए तुझको नहीं सजाते,
कि फिर निंद से जागने को दिल नहीं करता।
उम्र की राह में रास्ते बदल जाते हैं;
वक़्त की आंधी में इंसान बदल जाते हैं;
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करे लेकिन;
आँख बंद करते ही ख़यालात बदल जाते हैं।
कठिन है राह-गुज़र...
कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो;
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो;
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है;
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो;
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं;
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।