“जिनके पास अपने हैं वो अपनों से झगड़ते हैं जिनका कोई नहीं अपना वो अपनों को तरसते हैं कल न हम होंगे न गिला होगा सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिललिसा होगा जो लम्हे हैं चलो हंसकर बिता लें जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा”
कल जो मैंने एक बच्चे से पूछा: पढ़ाई कैसी चल रही है? उसका जवाब आया अंकल, समंदर जितना सिलेबस है; नदी जितना पढ़ पाते हैं; बाल्टी जितना याद होता है; गिलास भर लिख पाते हैं; चुल्लू भर नंबर आते हैं; उसी में डूब कर मर जाते हैं। :fallen_leaf::sleepy::fallen_leaf::innocent::palm_tree::stuck_out_tongue_closed_eyes::ocean::rage::heavy_dollar_sign: