इन दुनिया में :v: दो पौधे ऐसे हैं जो कभी :hibiscus: मुरझाते नहीं, और अगर जो मुरझा गए तो उसका कोई :hospital: इलाज नहीं, पहला :heart: ‘नि:स्वार्थ प्रेम’और दूसरा ‘अटूट विश्वास’
एक मुद्दत से मेरे हाल से बेगाना है;
जाने ज़ालिम ने किस बात का बुरा माना है;
मैं जो जिंदगी हूँ तो वो भी हैं
अना का कैदी;
मेरे कहने पर कहाँ उसने चले आना है।
इश्क़ वाले आँखों की बात समझ लेते हैं;
सपनों में मिल जाए तो मुलाक़ात समझ लेते हैं;
रोता तो आसमान भी है अपने बिछड़े प्यार के लिए;
फिर पता नहीं लोग क्यों उसे बरसात समझ लेते है।
यार था गुलज़ार था...
यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी मैं न था;
लायक़-ए-पा-बोस-ए-जाँ क्या हिना थी, मैं न था;
हाथ क्यों बाँधे मेरे छल्ला अगर चोरी हुआ;
ये सरापा शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना थी, मैं न था;
मैंने पूछा क्या हुआ वो आप का हुस्न्-ओ-शबाब;
हँस के बोला वो सनम शान-ए-ख़ुदा थी, मैं न था;
मैं सिसकता रह गया और मर गये फ़रहाद-ओ-क़ैस;
क्या उन्हीं दोनों के हिस्से में क़ज़ा थी, मैं न था।
याद आती है तुम्हारी तो सिहर
जाता हूँ मैं;
देख कर साया तुम्हारा अब तो डर जाता हूँ मैं;
अब न पाने की तमन्ना है न है खोने का डर;
जाने क्यूँ अपनी ही चाहत से मुकर
जाता हूँ मैं।