*एक महात्मा से मुलाक़ात हुई, तो मैंने गुज़ारिश की.. .... जिंदगी की कोई नसीहत दीजिये मुझे....* *उन्होंने सवाल किया, कभी बर्तन धोये हैं * *मैने हैरान होकर कहा, ....... जी धोये हैं।*
*पुछा,....क्या सीखा * *मैंने कोई जवाब नही दिया...* *वो मुस्कुराये और कहा.........* *"बर्तन को बाहर से कम और* *अंदर से ज्यादा धोना पड़ता है.......* *बस यही जिंदगी है।*
"सोने में जब जड़ कर हीरा, आभूषण बन जाता है, वह आभूषण फिर सोने का नही, हीरे का कहलाता है। काया इंसान ही सोना है और, कर्म हीरा कहलाता है, कर्मो के निखार से ही, मूल्य सोने का बढ़ जाता है।
अजीब रिश्ता हैं मेरा ऊपर वाले के साथ जब भी मुसीबत आती हैं न जाने किस रूप मे आता हैं हाथ पकड़ कर पार लगा देता हैं मैं उसके सामने सर झुकाता हूँ वो सबके के सामने मेरा सर उठाता हैं ।