"विचार ऐसे रखो कि तुम्हारे विचारों पर भी किसी को विचार करना पड़े, समुंदर बन कर क्या फायदा, बनना है तो छोटा तालाब बनो, जहां पर शेर भी पानी पिए, तो गर्दन झुका के..!!"
क्योंकि भोजन न *पचने* पर रोग बढते है...! पैसा न *पचने* पर दिखावा बढता है...! बात न *पचने* पर चुगली बढती है...! प्रशंसा न *पचने* पर अंहकार बढता है....! निंदा न *पचने* पर दुश्मनी बढती है...! राज न *पचने* पर खतरा बढता है...! दुःख न *पचने* पर निराशा बढती है...! और सुख न *पचने* पर पाप बढता है...!
*जीवन में अगर ''''खुश'''' रहना है तो,* *स्वयं को एक ''''शांत सरोवर'''' की तरह बनाए.....* *जिसमें कोई ''''अंगारा'''' भी फेंके तो..* *खुद बख़ुद ठंडा हो जाए.....!!!!*
नदी का पानी मीठा होता है क्योंकि वो पानी देती रहती है। सागर का पानी खारा होता है क्योंकि वो हमेशा लेता रहता है। नाले का पानी हमेशा दुर्गंध देता है क्योंकि वो रूका हुआ होता है।
यही जिंदगी है
देते रहोगे तो सबको मीठे लगोगे। लेते रहोगे तो खारे लगोगे। और अगर रुक गये तो सबको बेकार लगोगे।
एक छोटा किराना वाला,दूध वालाऔर सब्जी वाला आज भी तुमको उधार देने को तैयार है। आज देश में पैसा नहीं चल रहा पर एक भरोसे का व्यवहार चल रहा है ।ये भरोसे का व्यवहार उन छोटे दुकानदारों पे हमेशा रखना क्यों की हम ही एक दूसरे के पूरक है ये मोल या ऑनलाइन वाले नहीं